Monday, July 24, 2017

चक दे छोरियां

आज मैं लड़कियों को विश्व स्तर पर क्रिकेट खेलते हुए  देखकर अभिभूत हूँ। ऐसा लग रहा है मानो मेरा बचपन का सपना पूरा हो गया है। इन्हें देखकर स्कूल का अपना दिन याद आ गया जब लड़कियों के लिए खेलकूद प्रायः वर्जित क्षेत्र हुआ करता था।

अस्सी के दशक की बात है। बचपन से ही मुझे भाइयों के साथ क्रिकेट खेलने की छूट मिली हुई थी। बल्कि भाग-दौड़ वाले सभी खेल खेलने की आदत सी पड़ गई थी। जब मैं स्कूल में जाती थी तो वहाँ हम लड़कियों को गेम के नाम पर उछलने वाली रस्सी और रिंग-बॉल खेलने को मिलती थी। यह मुझे शारीरिक व्यायाम से ज्यादा कुछ नहीं लगता था। स्कूल में स्पोर्ट्स टीचर से मैं अक्सर क्रिकेट अथवा बैडमिंटन की डिमांड किया करती थी। इसके लिए कई बार अपने साथ पढ़ने वाली लड़कियों को लेकर अक्सर स्पोर्ट्स ऑफिस के सामने धरने पर बैठ जाया करती थी। कुछ देर तक स्पोर्ट्स टीचर जो वहाँ पी टी मास्टर कहलाते थे, उनसे मेरी क्रिकेट पर बहस हो जाया करती थी। उनका कहना था - ''लड़कियां क्रिकेट नहीं खेलती है, आजतक कभी किसी लड़की को क्रिकेट खेलते देखा है?'' मुझे उनका यह वक्तव्य और भी उद्वेलित कर देता था। चूंकि मैंने भी अपने अलावा वहाँ किसी और लड़की को क्रिकेट खेलते नहीं देखा था इसलिए मुझे उनके इस सवाल का सही जवाब नहीं सूझता। फिर मन में पीटी मास्टर साहब को कोसते और बुदबुदाते हुए झक मार कर अपने क्लास की ओर चल पड़ती थी।

हमारे मन को चुभने वाली बात यही तक नहीं थी। उसी वक्त वे डांटते हुए यह कहकर हमें भगा दिया करते थे कि ''तुम सब जाओ, गृहविज्ञान पढ़ो।'' जिस पीरियड में लड़के फुटबॉल और क्रिकेट खेला करते थे वही हम लड़कियों के लिए गृहविज्ञान पढ़ने का पीरियड हुआ करता था। उस वक्त हम सबका ध्यान अपने विषय पर कम और स्कूल प्रांगण में ज्यादा रहा करता था।

काश मेरी मुलाकात उस पी टी मास्टर साहब से होती, तो मैं उनको साक्ष्य के साथ बताती कि लड़कियां भी कितना उम्दा क्रिकेट खेलती हैं।

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, July 22, 2017

सावन के महीने में शिवकृपा

कॉलेज़ में परीक्षा हो जाने के बाद की छुट्टियाँ थी। मैं अपनी बुआ के घर आयी हुई थी। सावन का महीना था और पहला सोमवार भी। रिमझिम बारिश हो रही थी। सुबह-सुबह लड़कियों का एक झुंड अपने हाथों में धतूरे का फूल, फल, भांग, बेलपत्र और लोटे का जल लिए घर में घुसा और मुझे ढूंढने लगा। सुबह के सात बज रहे थे और मैं सो रही थी। उन दिनों पढ़ाई से छुट्टी लेकर सिर्फ खाना-पीना, सोना और खूब मौज-मस्ती का रूटीन था। इतने दिनों में अड़ोस-पड़ोस की लड़कियों के साथ मैं भी थोड़ा घुल-मिल गई थी। उस झुण्ड की आवाज मेरे कानों में आ रही थी लेकिन मैं उससे बचने के लिए अपने कानों को तकिये से दबाकर सोने की मुद्रा बनाये पड़ी हुई थी। लेकिन मुझे सोने नहीं दिया गया। 

बुआ ने झकझोरकर मुझे जबरदस्ती जगा दिया और बोली - ''जल्दी नहा-धो के तैयार हो लो, शिव मंदिर जाना है... सारी लड़कियां तुम्हारा इंतजार कर रही हैं।" 

आंगन में चहल-पहल और उन सखियों के हंसी-विनोद की बातें मेरे कमरे तक भी आ रही थी- ''देखा जाय इसबार शिव जी किस-किस पर प्रसन्न होते हैं''

अवधड़ दानी शिव की महिमा तो मैंने ख़ूब सुन रखी थी लेकिन मुझे अभी उनकी मंगल कृपा पाने की कोई जल्दी नहीं थी। लेकिन उसदिन मैं जबरदस्ती शिवालय भेज दी गई थी। बड़े अनमने होकर पहली बार ही मैंने उन्हें जल चढ़ाया था। पर इतनी जल्दी उनकी कृपा हमपे बरस जाएगी ये नहीं सोचा था। वर्षों से अपने वर के इंतजार में बैठी अनेक लड़कियों को इग्नोर मार के महादेवजी मुझपर इतने प्रसन्न हो गये कि अभी साल भी नहीं बीता कि मेरी शादी पक्की हो गई।

मुझे इतनी 'खुशियां' एक साथ मिल जाएंगी मैंने कभी सोचा न था। कहाँ दो-चार कपड़ो में कॉलेज का आना-जाना था.. और अब बिन मांगे बहुत कुछ मिल रहा था। अटैची भर-भर के रंग-बिरंगी साड़ियां, गहने, सुंदर-सुंदर चप्पलें, ब्यूटी किट और साथ में चार पहिये वाली गाड़ी भी। मैंने तो सोचा था पढ़-लिख कर कोई अच्छी सी जॉब मिल जाय तो एक-एक कर अपने सारे शौक पूरी करूंगी। लेकिन यहाँ तो 'बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न चून' वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। सुना था कि भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। इसे साक्षात् देखने और महसूस करने का मौका मेरे हाथ लग गया था।

एक सेट कौन पूछता है, पूरे डबल-ट्रिपल सेट सामान बक्से में कस-कस कर मिले। इस मामले में मायका और ससुराल दोनों मेरे ऊपर मेहरबान थे। अब इतनी सारी 'खुशियां' एक साथ बरस गयीं कि कैसे सम्हालू, कहाँ उठाऊँ, कहाँ धरूँ और कहाँ सरियाऊँ इसी उधेड़बुन में आज तक लगी हूँ। घर में जूते-चप्पल, कपड़े लत्ते, अब मेरे अकेले के ही नहीं हैं। पति व बच्चों के उससे चार-गुने हो गए हैं। आलमारियां छोटी पड़ रही हैं। इनसब चीजों को सम्हालने से अभी तक फुर्सत नहीं मिल पायी कि दुबारा शिवजी को जल चढ़ाने जाऊँ।

जल्दी-जल्दी अब सबकुछ समेट लेना चाहती हूँ ताकि अगली बार जल चढ़ाने से पहले थोड़ा 'स्पेस' रहे। कहीं शिवजी हमपे दुबारा प्रसन्न हो गए तो आगे क्या होगा!

(रचना त्रिपाठी)

Saturday, July 1, 2017

बहू-अधूरी

ससुराल में दो साल बीत गये। कमली की सारी कोशिशें नाकाम साबित हो रही थी। पूर्वा के मुकाबले वह कहीं नहीं टिक पा रही थी। दोनों बच्चों को स्कूल भेजने से लेकर रात में बिस्तर पर उन्हें सुलाते वक़्त लोरी की आवाज़ में भी अम्माजी पूर्वा को ही ढूँढती रहती। बच्चों की देखभाल में कहीं कोई कमी न आ जाए इसके लिए कमली भरसक कुछ भी उठा नहीं रखती। आज अधिक रक्तस्राव के कारण वह कमरदर्द से परेशान कमरे के भीतर पलंग पर लेटी पड़ी थी। उसकी आँखों के दोनों कोनों से झर-झर आँसू बह रहे थे।

अम्मा जी मोबाइल कानों पर लगाये  कमली की माँ से उसकी शिकायतों की गठरी खोलकर बैठ गयी थीं - "जबसे आयी है यह तीसरी बार है... आज चार दिन हो गया, बच्चों को न तो समय से नहलाया-धुलाया और न ही घर के किसी काम में हाथ बँटा रही है... पूछिए ज़रा, अपनी लाडली से कबतक मातम मनाएगी? जाने क्या सिखा-पढ़ा कर भेजा है आपने!"

-"ऐसी स्थिति में मन को दुःख तो होगा ही न समधिन जी! भला कौन स्त्री माँ बनना नहीं चाहती?  बिन बाप की बच्ची थी बेचारी... मैं भी अपनी परिस्थितियों के आगे मजबूर थी... इसमें उसका क्या दोष?" उसकी माँ ने विनती की।

"हाँ तो मैंने कब गिड़गिड़ाया था आपके सामने उसे अपनी बहू बनाने के लिए? ...और मेरे बेटे ने तो पहले ही साफ़-साफ़ कह दिया था कि उसे बीवी नहीं अपने बच्चों की माँ चाहिए। ....शील-संकोच तो मायक़े में ही छोड़कर आ गई थी। उसके कंठ ससुराल में आते ही खुल गए... और तो और सिर पर पल्लू आजतक नहीं ठहरता...  दुल्हन हमेशा पर्दे में ही शोभा देती है।" उनकी आवाज़ कमली के कानों में भाले की तरह चुभ रही थी। अम्माजी ने आज फिर उसकी माँ को कोसना शुरू कर दिया था। उससे रहा नहीं गया। पलंग से धीरे से उठकर दीवाल का सहारा लिए वह बरामदे में आकर खड़ी हो गई।

"अब तो अड़ोसी-पड़ोसी भी जान गए कि बहू पेट से थी। ...हमारी पूर्वा हमें छोड़कर चली गई लेकिन ऊँची आवाज़ तो दूर गुन्नू पैदा हो गया तब तक किसी ने उसकी झिरखिरी तक नहीं देखी। ये महारानी तो किसी की परवाह किए बिना सारा दिन बच्चों के साथ चपड़-चपड़ करती रहती हैं..." अम्मा जी का गुबार बाहर आ रहा था।

- "तो फिर शिकायत किस बात की अम्माँ जी? पूर्वा दी आपके बेटे की दुल्हन बनकर आयी थी और मैं दो बच्चों की माँ, तो पहले बच्चों को संभालू या पल्लू... इतना अंतर तो होगा ना मुझमें और उनमें...?" आज पहली बार अधूरी बहू का कंठ अम्मा जी के सामने खुल गया था।

(रचना त्रिपाठी)